ग्वालियर के आम आदमी की खर्च करने की एक सीमा है, जहाँ गाँव की शादियां तक कुछ पाँच एक लाख में पूर्ण हो जाती हैं। आम आदमी कोन, वो जो 50-70% वोट देने वाले लोगों का लगभग 90% होता है ग्वालियर जैसे शहर में, उसपर एक मोटरसाइकिल है, परिवार में अधिक सदस्य हैं, सड़क पर धूल है, रोज़ गिरने मारने की संभावना है।
ग्वालियर में राजनेता हैं और उनके बालक। ये वो श्रेणी है जिनकी वजह से ग्वालियर में Gucci, Hermes, Balenciaga, LV, Dior, Rolex जैसे ब्रैंड्स के बारे में हम लोगों को जानने को मिलता है। यह इंटरव्यूज़ में Gucci की लाख भर की चप्पलें पहनकर ग्वालियर की जानता के हितों की बात करते हैं, Balenciaga के लाख रुपये के जूते पहनकर मंदिरों में दर्शन करने जाते हैं लेकिन प्रकट रूप से यह सारी चीज़ें छुपाने के लिए 30 लाख की गाड़ी इनोवा में चलना पसंद करते हैं।घोर ईमानदारी की बातें नहीं करते चलिए, पर समस्या काले धन से अधिक है, समस्या दो हैं, एक कि यह सब लक्ज़री ब्रांड के जूते वह मफ़लर्स सफेद कुर्ते पजामे पर अच्छे नहीं दिखते, दूसरी यह कि यह लोग अपने स्वार्थ से भी एक नहीं हुए हैं, इनको एकांत में बैठ के अवलोकन करना चाहिए की आने वाले समय में यह गद्दी पर आसीन कैसे होंगे। स्वार्थ बड़ा है तो वो शायद भीड़ से हट गरीब आम आदमी से जुड़ कर ज़्यादा बेहतर पूरा हो सकता है, वह दो नंबर का पैसा आप चुनाव के एक दिन पहले लोगों में ना बांट कर पूरे पाँच साल उनके और अपने लाभ में खर्च कर सकते हैं, पर हाँ शायद यह ख्याल रहता होगा कि वोट तो जातिगत है या ख़रीदा जा सकता है। वर्तमान में तो ठीक लगता है सब पर इतिहास बताता है कि जब फ्रांस और रूस की एरिस्टोक्रेसी ने पीढ़ियों तक जनता की मेहनत पर अपने शौक पूरे करे तो जनता ने उनके सर तक अलग कर दिए, चलिए जनता भारत की गांधी से एक रही है, शांत है, सीधी है पर उनकी अगली पीढ़ी आप पर नज़र बनायी हुई है, शायद सड़क पर ना भी आए पर आप उस अगली पीड़ी को शक्ल कैसे दिखायेंगे (अटायर आपके वैसे भी अच्छे नहीं है)। शायद यह लोग व्यवसाय में रुचि रखते हों, पर फिर रोज़ रोज़ झूटे भाषण देकर अपनी मर्यादा को और गिराने से बेहतर ही है कि आप पूर्णतः व्यापार में समर्पित हो जायें, अर्थ व्यवस्था को ही लाभ मिल जायेगा।
व्यक्तिगत बात यह है कि मेरी उम्र 24 है, ज़्यादा टिपनी करना शोभा इसलिए नहीं देता क्योंकि धरातल पर मेरा कोई गहरा योगदान है नहीं, पर जो ज़िम्मेदारी की जगहों पर हैं उनसे उम्मीद और सवाल करना तो मेरा हक और मेरा फ़र्ज़ है। मैं भी इस समाज का एक हिस्सा हूँ, जवान हूँ, यह सब देख हसी आती है कि जिन चीज़ों में कोई मूल, कोई क़ीमत या कोई अर्थ नहीं है उन पर जनता का नेतृत्व करने वाले लोग संसद जैसी बिल्डिंग में फैंसी ड्रेस खेल रहे हैं। यह जनता से छुपाना चाहते हैं पर एक दूसरे को दिखाना चाहते हैं। जो व्यक्ति भारत जैसे देश की सबसे गरिमापूर्ण सभा का सदस्य है वो निश्चित ही धारणा के मुताबिक एक बहुत ही बड़े व्यक्तित्व का आदमी होगा, बड़ी हास्यास्पद बात यह है कि उस बड़े व्यक्तित्व को भी टुच्ची चीज़ों का सहारा लेना पड़ रहा है अपनी क़ीमत उभारने के लिए। कीमत गांधी की सरलता की थी उनकी धोती की नहीं। कीमत हेडगेवार के विचारों की थी उनकी टोपी की नहीं।
दरख्वास्त है उन सब नेताओं और wannabe नेताओं से कि अपना फ़ैशन सेंस बेहतर करें, सच से एक रहें, चोरी का है तो छुपा कर खर्च करें, चोरी का नहीं है तो जनता से दूर रहकर प्रदर्शित करें, आप एक ज़िम्मेदारी की जगह पर हैं, जानता आपमें ख़ुद को ढूँढती है, संसद में जिन कुछ महान लोगों के चित्र लगे हैं उनको देखते हुए अंदर प्रवेश करें, और संसद को प्रदर्शनी ना बनायें।
समस्या मेरी, कि मुझे इन लोगों में, उनके कार्यों में प्रेरणा जनक कुछ बात नहीं दिखी तो मेरी नज़र इनके कपड़ों पर, जूतों पर गई।


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